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साँप

कल मैंने एक साँप देखा,
सड़क पर रेंग रहा था ।
उसे देख ठिठका मन मेरा,
थोड़ा घबराया था।
फिर उसके हालात देख,
मन में विचार आया था ।
ये कैसी योनि थी उसकी,
जो ना उड़,ना चल,
ना तैर ही रहा था ।
रेंग -रेंग कर देह से,
राह में जा रहा था ।
उसे देख मन में ख्याल आया,
रेंगते हुए कितनी घायल होती
होगी इसकी काया।
कन्कड़ ,कांटे और भी न जाने क्या- क्या,
यूँ रेंगकर पार करता होगा।
क्या ये भी यूँ रेंग -रेंग कर रोता होगा।
कोसता होगा भगवान को मानव की तरह,
जो हर कर्म का आरोप प्रभु पर लगा देता हैं ।
अच्छा -बुरा सब उसकी मर्जी से होता हैं ।
ये कह पल्ला झाड़ लेता हैं ।
इस योनि में भी वह मुझे कर्मठ लग रहा था ।
अपने कर्तव्य के प्रति सजग लग रहा था ।
अकारण किसी को सता नही रहा था ।
बस अपनी राह में जा रहा था ।
साँप था वो खुलेआम घूम रहा था ।
आस्तीन में छुपकर डस नही रहा था ।

गरिमा राकेश ‘गर्विता ‘
कोटा,राजस्थान

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