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रानी लक्ष्मीबाई

मणिकर्णिका नाम था।
झाॅंसी की पहचान थी वह।
मनुज नहीं, अवतारी नारी थी वह।
झाॅंसी की आन, बान, शान थी वह ।
सोए देश को जगाने आई।
स्वतंत्रता की चिंगारी थी। ।

खोया माँ को , चार वर्ष की उम्र में।
थी पिता की दुलारी,नाम छबीली रखा था।
साथी नाना जैसा था उसका।
नाना संग खेल- खेल में,
सीखा चलाना, बरछी, भाला,कृपाण कटारी।
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना,
थे रानी के प्रिय खेल।।

खूब चलाती थी तलवार।
शास्त्रों में पारंगत थी वह।
ब्याही राजा गंगाधर संग।
थे मराठा शासक झाॅंसी के। ।

दुश्मन कई थे घर में ही।
रानी ने पहचान लिया था।
झलकारी प्यारी सखी थी।
मर मिटने को हरदम रहती तैयार। ।

1857 की पहली लड़ाई स्वतंत्रता की।
बनी सेनानायक लक्ष्मी रानी थी।
दुश्मन को धूल चटाई थी।
नारी सुकोमल, पति- बेटा खोया।
पर हिम्मत न हारी थी।।

पीछे पड़े अंग्रेज रानी के,
हर बार मुॅंह की खाई थी।
घेर लिया बड़ी फौज ने आकर।
पवन वेग से दौड़ती थी वह।
दिखलाती तलवार की धार।।

लड़ती रही अंतिम साॅंस तक।
निज सतीत्व की रक्षा करने,
दे दी आहुति अपने प्राणों की।
सशक्तिकरण की प्रतीक थी रानी।।

नारी कम नहीं किसी से।
सबक सिखा दिया सबको।
निज आचरण से, राह दिखा गई नारी को।
सम्मान दिला गई नारी को।।

चंद्रकला भरतिया
नागपुर महाराष्ट्र

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