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सन 1778 का मंदार पर्वत

 

 

बौंसी/बांका। तब भी मंदार पर्वत बहुत प्रसिद्ध था। इसे आप नीचे दिए गए चित्र में स्नान कर रहे लोगों की संख्या से भी जान सकते हैं।

 

उस समय यह सघन वन क्षेत्र था। काले चीतों और बाघों का यहां बसेरा था। गैंडे, हाथी, तेंदुए, सांप तो बहुतायत में थे ही दस्युओं का भय भी चरम पर था। तब मंदार पर्वत के नीचे का नगर #मंदारपुरी या #अपर_मंदार की यह राजधानी उजड़ चुकी थी। यहां छत्रपति नामक राजपूत के वंशजों के दो-चार घर थे। सभी संयुक्त परिवार थे। दो घर उन्होंने मजदूर वर्गों के बसाए थे।

 

उन दिनों 4 किलोमीटर दूर तक यहां नगर सभ्यता के साक्ष्य स्थल पर फैले थे। 1.8 मीटर व्यास के दर्जनों कुएं, मंदिरों के स्तंभों, अमलकों के अलावा देवता-देवियों-यक्षों की सैकड़ों मूर्तियां यत्र-तत्र बिखरे थे। मोर, साही, जाँघिल, गिद्ध, बाज जैसे जंतु तो सर्वाधिक थे।गिद्धों के विशाल सेमल वृक्षों पर निवास के कारण कई गांवों का नाम गिद्धासेमर था।

 

मंदार पर्वत के समीप से इस क्षेत्र का सबसे ज्यादा चलताऊ मार्ग गुजरता था जिसे बोगलीपुर-सूरी मार्ग कहते थे। यह मुख्य मार्ग गंगा के सुदूर उत्तरी हिस्से को दक्षिणी पठारी भाग से जोड़ता था। चीन, नेपाल और #मिथिला क्षेत्र से बैजनाथ या देघुर (देवघर), हज़ारीबाग़ तथा दक्षिण भारत तक जाने के लिए यह सर्वाधिक प्रचलन में आनेवाला मार्ग था।

 

विदित हो कि #देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के सभी तीर्थपुरोहितों व मठ-प्रधानों/सरदार पंडा के पूर्वज मिथिला के इसी मार्ग से देवघर पहुंचे। यह बंगाल को #भागलपुर (तब बोगलीपुर) से जोड़ने वाला दूसरा मुख्यमार्ग था। इस सड़क की पहचान के लिए इसके दोनों ओर मुगलों के समय से ही ताड़ के वृक्ष लगाए गए थे ताकि विशाल जंगल के बीच किसी ऊंचे टीले पर खड़े होकर भी इन पेड़ों को देखकर रास्ते का पता लगाया जा सके। इन रास्तों पर बीच-बीच में इमली के पेड़ थे जिन्हें देखकर यह समझा जा सकता था कि यहां जलस्रोत है।

 

ऐसे सघन प्रांत का सर्वे करने के लिए अंग्रेजों ने सन 1772 में जेम्स रेनेल को नियुक्त किया। रेनेल इस जंगली इलाकों को जानने वाले लोगों तथा कुछ हथियारबंद सोवर रक्षकों के साथ पालकी से निकला। वह नदी-नालों-गांवों तक पहुंचा और उसका विवरण लिखा। साथ-साथ मानचित्र भी तैयार करता रहा। नित्य सायंकाल को वह दिनभर की क्रियाविधि का अवलोकन कर अपने टेंट में सो जाता। उसने मुर्शिदाबाद, वर्धमान, वीरभूम, पंचेत, हज़ारीबाग़, मुंगेर तक के प्रक्षेत्रों में सघन वन पाया जिसकी उत्तरी सीमा में गंगा बहती थी। इसे #जंगलतरी डिस्ट्रिक्ट कहा। मंदार और देवघर जैसे ख्यात तीर्थक्षेत्र इसके अंदर थे। हालांकि, आज के नक़्शे की तुलना अगर रेनेल के बनाए नक्शे से करें तो 90 प्रतिशत विकृतियां मिलेंगी।

 

इन दोनों तीर्थक्षेत्रों में भी अंग्रेज अफसरों की रूचि बढ़ी। वे पेंटरों को लेकर आए ताकि इन स्थलों की पेंटिंग बनाई जाए। तब कैमरों का आविष्कार नहीं हुआ था कि क्लिक किया, शटर तेजी से गिरकर कर्र-कर्र खटाक की आवाज़ के साथ फोटो खींचे जाने का संकेत मिल गया।

 

यह वो समय था जब पेंटिंग्स बनाने वाले जलरंग (वाटर कलर) से कागज़ के मोटे बोर्ड या कपड़े पर दृश्य उकेरते थे। फिर उन फाइनल पेंटिग्स के नीचे या पीछे की ओर दृश्य, वर्ष और अपना नाम लिख देते थे। यह सब माहिर लोगों के द्वारा सुघड़ हाथों से बनाया जाता था।

 

जेम्स बार्टन सन 1773 से 1779 तक भागलपुर का कलक्टर था। इसी के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा पहली बार एक पेंटर सैम्युएल डेविड को कुछ विशिष्ट स्थानों की पेंटिंग्स बनाने के लिए भेजा गया। डेविड ने एक चित्र सन 1778 में मंदार पर्वत का बनाया।

 

नवंबर 1779 में ऑगस्ट्स क्लीवलैंड बार्टन की जगह आया तो यहां पेंटिंग्स तैयार करने के लिए विलियम होजेज़ को भेजा गया। होजेज़ द्वारा तैयार की गई सभी पेंटिंग्स में सर्वाधिक चर्चित वैद्यनाथ (देवघर) की पेंटिंग है। यह पेंटिंग उसने 1782 में तैयार की। वह यहां राजमहल के एक गांव से #बारकोप होते हुए आया था। विदित हो कि यही बारकोप अब योगिनी स्थान के नाम से प्रसिद्ध है। बारकोप में वह रुका भी मगर वहां कोई पेंटिंग तैयार की; इसका वर्णन नहीं मिलता है। न ही, पेंटिंग मिलती है।

 

इसके बाद तो कई पेंटर आए। चार्ल्स डॉयली, कैप्टन जेम्स क्रोकेट, एच. एच. विल्सन, रॉबर्ट स्मिथ, कॉलिन मैकिंजे, हेनरी सॉल्ट, एम्मा रॉबर्ट्स, हैरियट मैरी वुडकॉक, सीता राम (पटना स्कूल) जैसे दर्जनों पेंटर्स आये। किसी ने पेंसिल स्केच बनाए तो किसी ने वाटरकलर पेंटिंग्स।

 

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध ( सन 1876) में इस इलाके में पहली बार #कैमरा लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई) का सर्वेयर जेम्स डेविड बेगलर आया। उसने अपने सर्वे के क्रम में बहुत सारे फोटोज़ लिए और स्केच बनानेवाले से रेखांकन भी बनवाए। उनमें से चुनिंदा कुछ को अपनी पुस्तक में भी शामिल कराया। इनकी खींची गई तस्वीरें पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है।

 

 

सन 1810-11 में इस क्षेत्र का सर्वे करने के लिए फ्रांसिस बुकनन हैमिल्टन को भेजा गया। तब भागलपुर के कलक्टर थे एस.आर.एफ. हैमिल्टन। यह भागलपुर का दूसरा सर्वे था। बुकनन को खनिज पदार्थों और छिपे हुए खजाने को ढूंढने के लिए भेजा गया था मगर वह बॉटनिस्ट यानी वनस्पति शास्त्री था। उसने अपना काम बंगाली दुभाषिए के साथ रहकर सावधानी से किया। यह नोबल वर्क के तौर पर जाना जाता है।

 

 

सन 1778 में मंदार पर्वत की जो पेंटिंग सैम्युएल डेविड ने बनाई उसके अनुसार अब यहां बहुत कुछ बदल गया।

 

244 वर्ष पूर्व के मंदार में शीर्ष पर एक फ्लैट रूफ मंदिर दृष्टिगोचर होता है। इस मंदिर में #भगवान_मधुसूदन निवास करते थे। मुरारी गुप्तेर काड़चा और चैतन्य चरितावली से जानकारी मिलती है कि सन 1507 में इस मंदिर में उन्होंने मधुसूदन का दर्शन किया। नाथद्वारा मंदिर समिति द्वारा प्रकाशित 84 वैष्णवन की कथा से भी यह जानकारी मिलती है कि जब वल्लभाचार्य यहां आए थे तब उन्होंने रात्रिकाल शीर्ष के मधुसूदन मंदिर में विग्रह के समक्ष बिताया था। इस बारे में कई दर्ज़न ऐतिहासिक पुस्तकें बताती हैं कि शीर्ष के मंदिर में भगवान मधुसूदन विराजते थे। मगर अब यहां झक्क सफेद जैन मंदिर नज़र आता है।

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मंदार के पाद स्थित #पापहरणी सरोवर इस चित्र में बहुत फैला हुआ है। आज पापहरणी सरोवर इसका 8वां हिस्सा भी नहीं है।

 

इस पेंटिंग के निर्माण के 36 वर्षों बाद जब विलियम फ्रेंकलिन यहां आए तब उन्होंने पैराम्ब्युलर की मदद से इसकी परिधि ज्ञात किया। वे लिखते हैं कि 4 फर्लांग 40 यार्ड इसकी परिधि है। अगर मीटर में इसकी गणना की जाए तो यह 420.62 मीटर है। कहा जाए तो आधा किलोमीटर के लगभग। मगर यह पापहरणी अब कहाँ जो पाप धो ले! यह बहुत गंदा है और सरकारी अधिकारियों की कमाई का सिर्फ जरिया भर है। इसके बीच में सन 1999 में लक्ष्मीनारायण का एक मंदिर बना दिया गया। दुख इस बात का है कि इस वैष्णव क्षेत्र में यहां चोरी छिपे मत्स्यपालन भी होता है जिसे खाने के लिए धर्म-अपराधियों द्वारा अफसरों को निमंत्रित भी समय-समय पर किया जाता है। जन- मानस में इसके लिए रोष है।

 

इस सरोवर को गुप्तवंशी राजा आदित्यसेन ने 7वीं सदी में बड़ा कराया। कुछ इतिहासकार इसे वह पुष्करणी मानते हैं जिसके जल से उनका राज्याभिषेक किया गया। बुकनन के समय इसे मनोहर कुंड भी कहा जाता था।

 

पेंटिंग में दृष्टिगोचर इस सरोवर के दूसरी ओर बायीं तरफ जो बरगद का पेड़ नज़र आ रहा है वो अब विशालकाय हो गया है। इसकी भुजाओं को काटकर यहां समीप में सरकार ने धर्मशाला विकसित किया है।

 

इस बाल बरगद के दाहिनी ओर विशाल शिला पर एक मंदिर नज़र आ रहा है। जिसमें आगे का वरांडा 4 स्तंभों पर टिका हुआ दृष्टिगोचर है, वह अब बड़ा हो गया है। उसके मंदिर स्वरूप वाले गुम्बज को समाप्त कर उसे #सफाधर्म का मंदिर/धर्मशाला बना दिया गया है। 1956 में प्रकाशित ‘मंदार परिचय’ में डॉ. अभयकांत चौधरी लिखते हैं कि इस जगह पर सन 1949 में श्यामसुंदर धर्मशाला का निर्माण बाघमारी ग्राम की गूँजेश्वरी देवी ने अपने पुत्र की स्मृति में करवाया। इस बारे में उस समय एक शिलालेख भी था।

 

हो सकता है कि पेंटिंग में नज़र आ रहे इस मंदिर का किसी कारण से ध्वंश हुआ हो और वहां पहले धर्मशाला और बाद में सफाधर्म का पीठ निर्माण कर दिया गया हो।

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