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परीक्षाओं को नकल से मुक्त करने का प्रयास

विजय गर्ग
विजय गर्ग

विजय गर्ग
किसी भी प्रतियोगिता का उद्देश्य काबिलियत की परख करना होता
है। पुराने जमाने में यह काम शासकों की सेनाओं में भर्ती के लिए किया जाता था। तब ऐसे परीक्षाओं का पैमाना शारीरिक सौष्ठव हुआ करता था। आधुनिक समय में किसी भी प्रतियोग परीक्षा में पढ़ाई- लिखाई और दिमागी समझ इसका आधार बनी, पर योग्यता तय करने के जिस परीक्षा की जरूरत होती है, अगर उसमें कदाचार यानी नकल और पर्चा लीक जैसे घुन लग जाएं तो क्या होगा? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे निजात पाने की हर कोशिश पिछले एक-डेढ़ दशक में नाकाम साबित होती रही है। खास तौर से पेपर लीक और नकल कराने के मामलों में संगठित गिरोहों की घुसपैठ ने हालात बद से बदतर ही किए हैं, पर अब इसका एक पक्का इलाज मिलने जा रहा है।

 

सख्ती का उद्देश्य इसके लिए केंद्र सरकार ने संसद में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक 2024 बिल पेश किया है। लोकसभा और राज्यसभा में पारित होने के पश्चात इसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएग राष्ट्रपति की मुहर लगते ही यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा। इस विधेयक में नकल और पर्चा लीक आदि परीक्षा से जुड़े कदाचार के मामलों में एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने और 10 साल कैद का प्रविधान किया गया है। सभी तरह की सरकारी परीक्षाओं में किसी भी किस्म की गड़बड़ी करने वालों पर पूरी तरह लगम लगने के उद्देश्य से लाए गए इस विधेयक का मकसद देश के योग्य और प्रतिभावान युवाओं के साथ संगठित गिरोहों की हरकतों के कारण हो रही ज्यादती पर रोक लगाना भी है। हालांकि तमाम भर्ती परीक्षाओं में हो रही धांधलियों की रोकथाम के लिए कुछ राज्यों ने सख्ती की है। पेपर लीक जैसे मामलों में शमिल लोगें पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत कार्रवाई की गई हैं, लेकिन समय-समय पर आ रही कदाचार की घटनाओं से साबित हुआ है कि भर्ती परीक्षाओं में अवैध तरीकों से नैया पार लगाने की कोशिशें निरंतर जारी हैं। इसकी बड़ी वजह ऐसी धांधलियों के जरिये होने वाली बेहिसाब कमाई है, जिस कारण ऐसे काम संगठित गिरोह बनाकर अंजाम दिए जा रहे हैं।

 

उम्मीदवारों की हताशा जब कभी प्रतियोगी या प्रवेश परीक्षाओं में कदाचार की बात उठती है, तब सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवारों की हताशा का आता है। अहम प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रतिष्ठित कोर्सों की प्रवेश परीक्षाओं के पर्चे अगर पहले से लीक हो जाएं, भर्तियों में पैसे लेकर धांधली की जाए या सठगांठ कर नकल कराते हुए परीक्षार्थियों को उत्तीर्ण करा लिया जाए तो सबसे ज्याद कष्ट उन मेहनतकश परीक्षार्थियों को होता है, जो अपनी प्रतिभा के बल पर किसी परीक्षा मैं अपनी योग्यता साबित करने का प्रयस करते हैं। पेपर लीक से चंद खोखले छात्रों को फायदा जरूर होता है, लेकिन ये घटनाएं अन्य हजारों उम्मीदवारों और छात्रों के लिए बेहद कष्टकर होती हैं। कदाचार का यह अनवरत सिलसिला परीक्षार्थियों को परीक्षा के लिए दोबारा तैयारी करने से लेकर आने-जाने और तमाम खर्ची को वहन करने का ही विकल्प छोड़ता है, जिसकी भरपाई की कोई ठोस कोशिश हमारे देश में किसी सरकार ने नहीं की है। कभी-कभार कुछ राज्यों की सरकारों ने ऐसे मामले सामने आने पर परीक्षा की फीस दोबारा भरने से छूट जरूर दी और अभ्यर्थियों को रोडवेज की बसों में वापसी की मुफ्त यात्रा का विकल्प दिया, लेकिन इन हादसों से लगे घावों पर ऐसे मरहम ज्यत राहत नहीं देते ये घटनाएं लाखों बेरोजगारों की अत्यधिक आक्रोश से भर देती हैं। हालांकि योग्य छात्रों उम्मीदवारों को यह बर्दाश्त नहीं कि सिस्टम की खामियों का नतीजा वे भुगतें, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाएं फिर नहीं होंगे ऐसा आश्वासन कहीं से नहीं मिलता था।

 

समस्या की जड़ कहीं और असल में पिछले एक दशक में पर्चे लीक होने की घटनाओं का सिलसिला इतना बढ़ा है कि शायद ही कोई प्रतिष्ठित परीक्षा इसकी चपेट में आने से बच पाई हो। शिक्षक भर्ती के अलावा यूपी-पीसीएस, यूपी कंबाइड प्री-मेडिकल टेस्ट, यूपी- सीपीएमटी, एसएससी, ओएनजीस और रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं के पेपर हाल के कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर लीक हुए हैं। यह भी संभव है कि जी मामले उजागर नहीं हुए, वहां ऐसे चौर रास्तों से शायद सैकड़ों लोग नौकरी या प्रतिष्ठित कोर्स में दाखिला पा गए हों। चूंकि ये हादसे लाख इंतजामों और इनके गिरोहों के भंडाफोड़ और धरपकड़ के बाद भी धर्म नहीं हैं, इसलिए एक बड़ा सवाल यह है कि इस समस्या की जड़ कहीं और ती नहीं है? पेपर लीक कांडों का नहीं रुक पाना साबित करता है कि योग्यता का मापदंड तय करने वाली परीक्षा प्रणाली की व्यवस्था पूरी तरह लुंजपुंज हो गई है सरकारी व्यवस्था पर्चा लीक बाली घटनाओं को बहुत हल्के में लेती रही है, इसीलिए यह मर्ज लाइलाज बनता चला गया।

 

 

यही कारण है कि जिन परीक्षाओं को हर योग्यता का मानक बनाया गया है, वे परीक्षाएं ही बेमानं प्रतीत होने लगीं। इच्छाशक्ति से मिलेगा समाधान तंत्र की नाकामी और अधिकारियों की सुस्ती एवं पर्चा लीक कराने वाले अपराधियों पर कोई अंकुश लगना नामुमकिन नहीं है, बशर्तें सरकारें और संबंधित विभाग ऐसा करना चाहें इस समस्या का एक पहलू बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों की बढ़ती चाहत से भी जुड़ा है। ऐसी ज्यादातर प्रतियोगी परीक्षाओं में कुछ सौ या हजार पदों के लिए आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। शिक्षक भर्ती जैसी नौकरियों के लिए योग्यता हासिल करने वाली टीईटी और सीटीईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं तो एक कदम आगे बढ़ गई हैं। ये परीक्षाएं न तो कोई शैक्षिक योग्यता प्रदान करती हैं और न ही नौकरी दिलाती हैं, लेकिन नौकरी के लिए येग्य होने की ऐसी सीढ़ी बन गई हैं, जिसके माध्यम से नौकरी का कौरा आश्वासन ही मिलता है। फिर भी आलम यह है कि इनके आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। इसी तरह अन्य सरकारी नौकरिये और मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षओं में तो दसियों लाख परीक्षार्थियों का शामिल होना अब आम हो गया है। मांग ज्यादा और आपूर्ति कम होने की इन्हीं वजहों से सिस्टम में भ्रष्टाचार और अवैध हथकंड़ों की भूमिका बढ़ गई है। दूसरी तरफ समाज का एक खतरनाक रवैया भी सामने आया है, जिसमें लोग अपने बच्चों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने वाली सरकारी नौकरियों आदि की तरफ ठेलना चहते हैं।

 

इस मामले में वे यदि वैध तरीकों से सफल नहीं हो पाते हैं तो इसके गैरकानूनी रास्तों को आजमाते हैं। ऐसे ही लोगों में बहुत से ऐसे हैं, जो डोनेशन देकर अच्छे संस्थान की सीटें अपने बच्चों के लिए खरीदते हैं। यहां वे लोग हैं, जो किसी भी प्रवेश या भर्ती परीक्षा का पर्चा हासिल करने के हथकंडों को आजमाने की कोशिश करते हैं। इन्हीं लोगें की वजह से उन लाख युवाओं की मेहनत और प्रतिभा व्यर्थ हो जाती है, जो अपनी काबिलियत के बल पर अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। हालांकि सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित सधनों की रोकथाम) विधेयक 2024 के प्रारूप और सुझावों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ईमानदार और योग्य युवाओं की राह रोकने वाले भ्रष्ट तंत्र पर पहरा बैठाना और संगठित गिरोह के रूप में नकल आदि कदाचार को बढ़ावा देने वाले लोगें पर लगाम लगाना ज्या मुश्किल नहीं है। यह काम राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ कड़े कानून बनाने और उस पर अमल सुनिश्चित करने से हो सकता है। यहाँ यह समझने की जरूरत है कि परीक्षाओं को आनलाइन कर देने या पच की परीक्षा से पहले लाकरों में बंद कर देने भर से इंसान के अवगुणों पर पहरा नहीं बैठ जाता है। इसके लिए जरूरी है कि दोषियों की धरपकड़ हो और उन्हें सख्त सजा दी जाए। उम्मीद है कि परीक्षाओं में कदाचार रोकने संबंधी ताजा कानून पहल सिस्टम के दोषों को दूर करेगी और बेरोजगारी से बुरी तरह त्रस्त इस देश और इसके योग्य एवं प्रतिभावान युवाओं के सपनों को आकार देने संबंधी माहौल का सृजन करेगी।

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