Your SEO optimized title

विनाश का उद्गार

ईर्ष्या को कहते अभिशाप है।
ईर्ष्या अभाव से जन्मी भावना है।
श्रम कर्म का मानव करते हैं त्याग ,
तब ही विनाश का उद्गार पनपता है।

स्व पर ईर्ष्यालु को संतोष नहीं ।
जीवन आनन्द से वंचित रह जाता ।
दूसरों की वस्तु पर नजर गढ़ाता है।
अपनी गरीब आत्म छवि दर्शाता है।

क्रोध,अक्रोश, संकीर्ण विचार है।
निंदा ही इसकी बन जाती पहचान ,
सद्गुणों का हो जाता है इससे ह्वास।
खुद के चरित्र का हो जाता है विनाश।

ईर्ष्या देती है स्पर्धा को निमंत्रण।
यही हीनता की भावना का स्रोत है।
असमर्थता का होता इसमें अवलोकन।
नफरत की ऑंधी मन को करती विकल।

स्वरचित
डॉ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर,बिहार

Leave a Comment

error: Content is protected !!