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वारिसलीगंज के नेवाजगढ़ मैदान में आयोजित विराट शिव शिष्य महोत्सव में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, करीब एक लाख शिव शिष्यों ने लिया भाग

वारिसलीगंज (नवादा): वारिसलीगंज नगर परिषद के नेवाजगढ़ मैदान में सोमवार को शिव शिष्य हरिद्रानंद फाउंडेशन द्वारा विराट शिव शिष्य महोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बिहार के नवादा, नालंदा, शेखपुरा, बरबीघा, जमुई, बाढ़, बख्तियारपुर, गया सहित झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि स्थानों से करीब एक लाख शिव शिष्यों ने पूर्ण श्रद्धा भक्ति के साथ उत्साह पूर्वक भाग लिया। लगा मानों आस्था और भक्ति का जनसैलाब उमड़ पड़ा हो। चारों तरफ शिव शिष्यों की भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी।

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हजारों वाहनों से लोग कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। भीड़ स्वानुशासित थी।
कार्यक्रम का आयोजन महेश्वर शिव के गुरु स्वरूप से एक एक व्यक्ति का शिष्य के रूप में जुड़ाव हो सके, इसी बात को सुनाने और समझाने के लिए किया गया।शिष्य परिवार के संस्थापक पूज्य हरिद्रानंद जी के बड़े सुपुत्र अर्चित आनंद ने शिव शिष्यता, एक आध्यात्मिक उत्कर्ष विषय पर चर्चा की। भैया अर्चित आनंद ने कहा कि यह अवधारणा पूर्णतः आध्यात्मिक है, जो भगवान शिव के गुरु स्वरूप से एक एक व्यक्ति के जुड़ाव से संबंधित है।उन्होंने कहा कि शिव के शिष्य एवं शिष्याएं अपने सभी आयोजन शिव गुरु हैं, और संसार का एक एक व्यक्ति उनका शिष्य हो सकता है, इसी प्रयोजन से करते हैं।उन्होंने कहा कि शिव गुरु हैं, यह कथन बहुत पुराना है। भारत भूखंड के अधिकांश लोग इस बात को जानते हैं कि भगवान शिव गुरु हैं, आदि गुरु एवं जगत गुरु हैं। हमारे साधुओं, शास्त्रों और मनीषियों द्वारा महेश्वर शिव को आदि गुरु, परम गुरु आदि विभिन्न उपाधियों से विभूषित किया गया है।शिव शिष्य साहब हरिद्रानंद जी के संदेश को लेकर आई कार्यक्रम की मुख्य वक्ता तथा साहब जी की बड़ी पुत्रबधु दीदी बरखा आनंद ने सर्वप्रथम मकर संक्रांति उत्सव की महत्ता के बारे ने विस्तार से बताय। उन्होंने कहा कि शिव केवल नाम के ही नहीं अपितु काम के गुरु हैं।

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शिव के औघड़दानी स्वरूप से धन, धान्य, संतान, संपदा आदि प्राप्त करने का व्यापक प्रचलन है, तो उनके गुरु स्वरूप से ज्ञान भी क्यों नहीं प्राप्त किया जाय ? किसी संपत्ति या संपदा का उपयोग ज्ञान के अभाव में घातक हो सकता है।दीदी बरखा आनंद ने कहा कि शिव जगत गुरु हैं।इसलिए जगत का एक एक व्यक्ति चाहे वह किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग का हो, शिव को अपना गुरु बना सकता है शिव का शिष्य होने के लिए किसी पारंपरिक औपचारिकता अथवा दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। केवल यह विचार कि शिव मेरे गुरु हैं, शिव की शिष्यता की स्वमेव शुरुआत करता है।इसी विचार का स्थाई होना हमको आपको शिव का शिष्य बनाता है।

 

बता दें कि सोमवार 15 जनवरी को उनका जन्मदिन भी था। गौरतलब है कि शिव शिष्य साहब हरिद्रानंद जी ने 1974 में शिव को अपना गुरु माना।1980 के दशक तक आते आते शिव की शिष्यता की अवधारणा भारत भूखंड के विभिन्न स्थानों पर व्यापक तौर पर फैलती चली गई। शिव शिष्य साहब हरिद्रानन्द जी और उनकी धर्मपत्नी दीदी नीलम आनंद के द्वारा जाति, धर्म, लिंग, वर्ण, संप्रदाय आदि से परे मानव मात्र को भगवान शिव के गुरु स्वरूप से जुड़ने का आह्वान किया गया।सर्वप्रथम शिव शिष्यों द्वारा शिवनाम संकीर्तन के पश्चात शिव शिष्य परिवार के नवादा जिलाध्यक्ष राधाकृष्ण बनकर ने आगतों का स्वागत किया. शेखपुरा के आरपी सिंह ने महोत्सव के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।

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शिव शिष्यायों द्वारा हमारे गुरु शिव – एक अनुभूति का 7 मिनट का कार्यक्रम पेश किया गया।रांची से आए शिव कुमार विश्वकर्मा ने शिव शिष्यता के तीन सूत्र पर प्रकाश डाला।सोमेंद्र कुमार झा, रांची ने जगत गुरु शिव की शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन पर विस्तृत चर्चा की। पुनः शिव शिष्यों द्वारा भजन की प्रस्तुति की गई। सुरेश प्रसाद सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। महोत्सव को सफल बनाने में शिव शिष्य परिवार के नवादा जिलाध्यक्ष राधाकृष्ण बनकर, आयोजन समिति अध्यक्ष उमेश चंद्र, मनीष मालाकार, पिंकी, अल्पना, राजू, दीप नारायण, अरविंद, परमेश्वर राय (सहरसा), शशि शेखर आदि का विशेष योगदान रहा।

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