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स्वीकार का साहस

विजय गर्ग

जिंदगी में सुकून, सम्मान और सफलता की चाहत हर किसी को होती है, लेकिन इसे पाने के लिए कुछ ऐसे नैतिक मूल्य हैं, जिनको अपनाना बेहद जरूरी है। बचपन से ही हमें सही ज्ञान, संस्कार और गुण मिले हैं, जिनसे हम सही गलत का बोध कर पाते हैं, सही दिशा का चुनाव कर पाते हैं, गलत चीजों को नकार पाते हैं तो यही हमारे व्यक्तित्व को ऊंचा उठाने में मदद करेगा । नेपोलियन हिल ने इस संदर्भ में बहुत अच्छी बात कही है कि जीवन संघर्ष में संस्कार, नैतिक मूल्य और मानवीय गुण एक व्यक्ति के सबसे बड़े शास्त्र और औजार होते हैं, जिनके माध्यम से वह जीवन को सुकूनदेह और सार्थक बना सकता है और सफल हो जाता है।

 

किसी भी देश, समाज या परिवार में रहने के कुछ कायदे होते हैं और इनके प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारियां भी होती हैं। देश या समाज का नागरिक ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होता है। अगर हम खुद को, अपने देश और समाज को सुकून, सम्मान और सफलता दिलाना चाहते हैं, तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों, जैसे कचरा और प्रदूषण न फैलाना, अवैध और गैरकानूनी कामों में लिप्त न रहना और लोगों की मदद करना आदि को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लेना चाहिए । विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि महानता की कीमत जिम्मेदारी है। यानी हमको लोगों से सम्मान पाना है और एक सफल व लोकप्रिय इंसान बनना है तो समाज के प्रति जिम्मेदार, उदार और कर्तव्यनिष्ठ होना पड़ेगा। कहने का आशय यह कि समाज का जैसा व्यवहार हम अपने लिए अपने लिए अपेक्षा करते हैं, वैसा ही व्यवहार हमें समाज को देना चाहिए। तभी हम समाज से अच्छे व्यवहार का अधिकार पाने की उम्मीद कर सकते हैं। यों भी यह महत्त्वपूर्ण है कि हम दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करें, जैसे व्यवहार की हम दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा करते हैं ।

 

दरअसल, संवेदनशीलता भी एक आवश्यक मानवीय गुण है। हम दूसरों के सुख-दुख, उनके दर्द का खयाल रखें और उनके प्रति नरमी और दयालुता का भाव रखें तो बदले में हमें भी दूसरों से ऐसा ही व्यवहार मिलता है। इससे सामाजिक दायरा भी बढ़ता है और हमारी विश्वसनीयता में भी इजाफा होता है । नतीजतन, हम अपने पेशेवर या कारोबारी जीवन में भी हर किसी के चहेते बन जाते हैं और सफलता की राह पर आगे बढ़ते चले जाते हैं। समाज में सम्मान उन्हीं लोगों को मिलता है जो दूसरों के प्रति संवेदनशील और परोपकारी होते हैं । यह गुण सफलता और मानसिक सुकून के लिए भी बेहद जरूरी है। दूसरों को दुख देने या परेशान करने की कोशिश करने में संलिप्त लोग हमेशा बेचैन रहते हैं और अपने ही व्यक्तित्व के दर्जे को कमतर करने में जाने-अनजाने सहभागी बनते हैं ।

 

कड़वे वचन हमेशा अप्रिय होते हैं। जीवन में सम्मान और सफलता पाने के लिए विनम्र होना बेहद जरूरी है। यह हम अपने अनुभव से भी समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति हमसे नाहक ही कड़वी भाषा में बात करता है, तो हमें वह अच्छा नहीं लगता और कई बार उससे दुख भी पहुंचता है । विनम्रता सभ्य होने की निशानी है, जबकि कठोरता एक कमजोर आदमी की झूठी ताकत है, जिसके जरिए वह अपनी कमजोरी को छिपाने और दूसरों पर हावी होने की कोशिश करता है। विनम्रता दरअसल महानता को दर्शाती है और बड़प्पन की पहचान है। सफलता और विनम्रता साथ-साथ चलती है। एक विनम्र मगर कम प्रतिभाशाली इंसान जीवन में किसी ज्यादा प्रतिभाशाली, मगर अशिष्ट या कटु स्वभाव के इंसान से हमेशा आगे रहता है। कोई भी व्यक्ति अपने आसपास विनम्र व्यक्ति को ही पसंद करेगा।
आज जब हर तरफ अविश्वास और धोखाधड़ी का बोलबाला है। ऐसे में आज की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए विश्वसनीयता बेहद आवश्यक है। साथ ही इससे मानसिक सुकून भी मिलता है, क्योंकि हमें कुछ छिपाने या खुद को बचाने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़ती है। सिर्फ अपनी सेवाओं और उत्पाद ही नहीं, बल्कि वादों के प्रति ईमानदार रहना जरूरी है।

 

इस मसले पर व्यवहार विशेषज्ञों का कहना है कि कभी भी किसी ईमानदार आदमी को अपने स्वभाव और काम का विज्ञापन या प्रचार नहीं करना पड़ता । उसकी प्रशंसा अपने आप फैलती रहती है और लोग उसकी कद्र करते हैं । ईमानदार इंसान आसानी से लोगों का भरोसा जीत लेता है। हमेशा कुछ पाने और लोगों से लेने की कोशिश या चाहत कभी सम्मान नहीं दिला सकती। इसलिए त्याग न सिर्फ सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में, व्यक्तिगत जीवन में भी जरूरी होता है। दोस्ती निभाने और परिवार को बांधकर रखने में भी इसका काफी महत्त्व है । निजी या पेशेवर जिंदगी में सुकून, सम्मान और सफलता के लिए त्याग की प्रवृत्ति बहुत जरूरी है। यहां त्याग का तात्पर्य धन-संपत्तिया मोहमाया त्याग कर तपस्या करने या साधु संन्यासी बन जाने से नहीं है। यहां त्याग का मतलब है किसी की बड़ी खुशी के लिए अपनी किसी छोटी खुशी या जिद का त्याग कर देना, किसी को सुख देने के लिए अपने अहंकार या क्रोध का त्याग कर देना, किसी ज्यादा जरूरतमंद या असहाय व्यक्ति के लिए अपनी बारी का त्याग करके उसको मौका दे देना। अपनी जरूरत से ज्यादा चीजों और संसाधनों पर कब्जा जमाए रखने की वास्तविकता की पहचान कर, उसे स्वीकार कर दूसरों के हक का हिस्सा उसे सम्मान से सौंपना ही असली त्याग और साहस है ।

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