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कविता कानन

श्रमिक

श्रमिक

 

– मोनिका डागा “आनंद” , चेन्नई , तमिलनाडु

 

 

मजदूर करता है दिल से मजदूरी,

कर्म उसका है प्रधान मिलती मजूरी,

उनका स्वाभिमान होता है जिंदा,

नहीं करते हैं वह किसी को शर्मिंदा ।

 

कठिन परिश्रम उनकी रग-रग में बहता,

मेहनत की कमाई से ही जीवन कटता,

किसी के सामने वे हाथ नहीं फैलाते,

अपने दुखों का शोर नहीं मचाते ।

 

धूप, बरसात,या हो फिर कड़ाके की ठंड,

कर्म है उनकी पूजा, धर्म और जीवन मापदंड,

मजबूरी नहीं उनकी “आनंद” भरी मुस्कुराहट देखो,

उनसे आत्मविश्वास, शारीरिक, मानसिक बल सीखो ।

 

विधाता का लिखा हुआ भाग्य वो स्वीकारते हैं,

शिकायतें नहीं जीवन में समाधान निकालते हैं,

बच्चों को अपनी श्रम जीविका से पढ़ाते हैं,

संस्कारों में उन्नत उनका सुखद भविष्य बनाते हैं ।

 

उनका जीवन उनका कर्म उनकी शान है,

उनका भी मान, सम्मान, आन-बान है,

रोज़मर्रा की आवश्यक सुविधा उनको भी मिले,

जीवन में उनके भी खुशियों के गुल खिले ।

 

आभारी है राष्ट्र उनके उत्कृष्ट अमूल्य योगदान का,

उनसे ही सुसज्जित है नवीनीकरण उन्नत देश का,

अधिकारी है हर व्यक्ति मान सम्मान का,

श्रमिक टुकड़ा है खूबसूरत इसी आसमान का ।

 

आई गर्मी

आई गर्मी

  मोनिका डागा “आनंद” , चेन्नई, तमिलनाडु

 

गर्मी तो हद पार कर गई,

अरे ! अरे ! आ गई है मई,

तापमान जा रहा है 50 के पार,

सबको चढ़ रहा है गर्मी से बुखार ।

 

दोपहर में बारह से चार,

आवा जाही बंद करो यार,

प्याज को साथ में रखो भाई,

लू चलती हवाओं ने नानी याद दिलाई ।

 

चपरासी हो या वी.आई.पी. कोई ब्राइट,

गर्मी ने सबकी हवा कर दी टाइट,

श्री मती जी का ब्रांडेड मेकअप धुल जाता,

चेहरे का रंग उडा़ उड़ा नज़र आता ।

 

चेहरे पर देखो झुर्रियां दे रही दिखाई,

बालों पर लगा रखी है गार्नियर वाली डाई ,

बिजली का बिल भी बढ़ रहा,

ठंडे पानी से मन बहल रहा  ।

 

आइसक्रीम, छत्ते खाने की ऋतु आई,

खरबूजा, तरबूज, सौंफ,सत्तू का शर्बत, ठंडाई,

खीरा बन गया है देखो हीरा,

भाता नींबू पानी,आम पन्ना और जलजीरा ।

 

ध्यान रहे शरीर में पानी की कमी ना होवे,

काम सबको है करना आंखों में नमी न होवे,

सर्दी है प्यारी तो गर्मी से क्यों कर रहे हो लड़ाई,

हर मौसम की अपनी खूबसूरती और बडा़ई ।

 

मौसम के अनुरूप करो खान-पान,

गर्मियों में तुम रखो बच्चों का विशेष ध्यान,

बारिश के पलों को करते रहो याद,

मन रहे हमेशा खुशियों से आबाद ।

 

कोल्ड ड्रिंक से बनाए रखो दूरी,

मटके का अमृत पानी पीना है जरूरी,

ताजे फलों के जूस में है मिठास,

मट्ठा, छाछ पीयो भर-भर गिलास ।

 

गाते रहो प्यार के सुहाने गीत,

“आनंद” है हर तरफ बरसे मधुर प्रीत,

प्याऊ लगाओ पशु-पक्षियों को दो दाना पानी,

जीवन है परिवर्तनशील सुख दुःख की “आनंद”कहानी।

 

 

बृज में मची है धूम

बृज में मची है धूम

मोनिका डागा "आनंद" , चेन्नई , तमिलनाडु
मोनिका डागा “आनंद” , चेन्नई , तमिलनाडु

 

बांसुरी बुला रही है गिरधर कि,ब्रज की गलियों में मचा है शोर,

फागुन मास में चंग बजे घर-घर, आई होली मन में भरे प्रेम हिलोर ।

 

अलि चलो इस बार,होली में चले वृंदावन सभी सखियों संग,

कन्हैया को लगाएंगे खूब रंग, बृजवासियो संग मिल बेधड़ग,

राधिका के संग मिलकर,मारेंगे पिचकारी उड़ाएंगे फूलों से बने सुगंधित रंग ,

रंगों का रास रचेगा ब्रज में अति सुंदर,अंतरात्मा पर भी चढ़ेगा भक्ति का रंग ,

फागुन मास में चंग बजे घर-घर……

 

लीलाधारी प्रभु की कृपा से, होली में धूम धाम मचाएंगे रंगेंगे तन मन संग ,

अमृत भर लेंगे जीवन में ऐसे, मनहु भंवरा पीले मधुर मकरंद,

श्यामा – श्याम की मतवाली, ब्रज की होली में गोवर्धन भी जाएंगे,

सभी घाटों के दर्शन कर,एक दूजे को प्यार का बढ़-चढ़कर रंग लगाएंगे,

फागुन मास में चंग बजे घर-घर……

 

फूलों की होली भी खेलेंगे उछालेंगे,बेला, गुलाब,चंपा, पीली, कनेर ,

बिहारी जी के मंदिर में लगाएंगे राधे रानी का भी जयकारा घनेर,

ठाकुर जी के संग हम भी खाएंगे, गुजिया,मालपुआ, लड्डू मिठाइयां अनेक,

सुपारी,लौंग ,इलाइची, केसर का बीड़ा चबाएंगे, गाएंगे धमाल विशेष,

फागुन मास में चंग बजे घर-घर……

 

लठमार होली भी खेलेंगे जो है विश्व भर में ब्रज की प्रसिद्ध,

रंगों में रंग कर एक हो मोहन से पाएंगे जीवन में ठाकुर का दिव्य सानिध्य,

मानो स्वर्ग उतर आएगा धरती पर, स्वर्ग से सभी देवी देवता अंबर से फूल बरसाएंगे,

दुखों को भुलाकर माधव का धन्यवाद कर, होली की मस्ती में हम सब भी खो जाएंगे ।

फागुन मास में चंग बजे घर-घर……

 

फगुनाहट

फगुनाहट

- मोनिका डागा "आनंद" , चेन्नई

– मोनिका डागा “आनंद” , चेन्नई 

 

मौसम ने ली अब अंगड़ाई है, शीत ऋतु बीती,
ग्रीष्म की लहर उमड़ आई है,
गर्म कपड़ों की शुरू हो गई रख रखाई,
सूती हल्के रंगों के कपड़ों की बारी आई है ।

 

मदमस्त पवन बह रही, प्रकृति ने किया सोलह श्रृंगार,
मधुमास में खिला हर तन मन, होली का आया पावन त्यौहार,
दहन किया सब दुःख संताप,जागृत किया भीतर प्रेम,
प्रकृति के आनंद में रंग गए सब, खुशियां बिखरी चहुं दिस छाया प्रेम ।

 

फगुनाहट आई, लाई धीरे – धीरे, अपने संग परिवर्तन का संदेश,
हर मन को अपना लो तुम, सहज भाव से, ना रहे कोई दुख का कण भीतर अवशेष,
मुस्कुराओ, मुस्कुराहट फैलाओ, जीवन में करो सतरंगी रंगों का समावेश,
हर हाल में तुम खुश रहो, जीवन का हर दिन है अपने आप में विशेष ।

 

जीवन में नीरसता का अंत कर, बहाओ अमृत रस परमानंद,
छोटी-छोटी खुशीयों का लो,जीवन में भरपूर “आनंद”,
प्रकृति सदैव मुस्कुराती है,मौसम हो कोई भी,शीत, पतझड़, गर्मी, बरखा या बसंत,
तुम भी अपना लो इस भाव को जीवन में, हो कोई भी उतार – चढ़ाव, बस जागृत रहे प्रेम रंग अनंत।

 

युवाओं को समर्पित  वंदे भारत

 

 

हे युवाओं,देश बचाओ

हम करते तुम्हारा आव्हान

तुम ही भविष्य भारत का हो

तुमसे ही अब देश की पहिचान ।।

 

मन के उपवन में हे युवाओं,

कुछ ऐसे उपजाओ विचार

मन कर्म भूमि में रम जाए

चैतन्य रथ पर होके सवार ।।

 

भारत मां के लाल तुम्हीं हो

देश का वर्तमान तुम्हीं हो

तुम्हीं नीव बनो अब भारत की

देश का गौरव अभिमान तुम्हीं हो ।।

 

दूर हो निर्विघ्न ही विकार तुम्हारे,

देश हित में कोई करो काम तो

करना स्वामी विवेकानंद का ध्यान

युवाओं में सफल जिनकी पहचान ।।

 

©®आशी प्रतिभा ( स्वतंत्र लेखिका) 

 

मन में राम 

मन में राम 

 

राम नाम बहुत सुखदाई

जो जाप करे सो ,

अनंत सुख पाई ।।

 

मन में मेरे श्री राम बसे

कण कण में श्री राम बसे

अनन्य भक्ति रस में डूबी नगरी

अयोध्या मेरे भारत में बसे ।।

 

फिर भी धरा पर देखो कितने,

मेरे प्रभु श्री राम पर कष्ट पढ़े।

चौदह बरस का वनवास लेकर,

अयोध्या माता की खातिर छोड़ गए ।।

 

जिसने जन्म लिया भारत में

आज उसका अस्तित्व मिटने को

उमर पड़ी थी भीड़ बहुत ही

जब बाबर मस्जिद बनाने को।।

 

तब सत्य सनातन जगा फिर

राम को न्याय दिलाने को

संघर्ष बहुत था मन में सबके

श्री राम का मंदिर बनवाने को ।।

 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं

आज सत्य प्रगट यह होता हैं

अपनी मर्यादा में रहकर ही देखो,

न्ययालय से जीती आज अयोध्या हैं।।

 

©®आशी प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका)

मध्य प्रदेश, ग्वालियर

भारत

संगत

संगत

विभा वर्मा वाची राँची झारखंड
विभा वर्मा वाची
राँची झारखंड

सत संगत ही कीजिए,जग में होता नाम।
बुरे लोग को देखिए ,कर देते बदनाम।।

नित्य कर्म करते रहें,मिले वहाँ सम्मान।
असर बुरा होता तभी ,संगत को पहचान।।

संगत संतों का करें,भरें ज्ञान भंडार।
ज्ञान-ध्यान के जाप से,ख़ुशियाँ मिले अपार।।

संगत दुर्जन का हुआ,नाम हुआ बदनाम।
असर कुसंगति का दिखा,नहीं मिला था दाम।।

संगत विदुषी का रहे,बन जाते विद्वान।
दुष्टों की संगति कहें ,बुराइयों की खान।।

रच प्रपंच शकुनि यहाँ,बिछा झूठ का जाल।
संगत का दिखता असर ,हाल हुआ बेहाल।।

संगति बुरी न कीजिए ,संग बुरी दे हानि।
संतों की संगति भली,अभी उसे अपनानि।।

संगत कीजे साध कर,करते अच्छा काम।
मिले ज्ञान सत्संग से ,जपना हरि का नाम।।

संगत संतों का करें ,जीवन हो खुशहाल।
नीरस जीवन को भला,सकता कौन सँभाल।।

संगत संतों का करें ,कहती वाची जान।
दुष्टों की टोली बुरी, जाने सकल जहान।।

विभा वर्मा वाची
राँची झारखंड

विनाश का उद्गार

विनाश का उद्गार

ईर्ष्या को कहते अभिशाप है।
ईर्ष्या अभाव से जन्मी भावना है।
श्रम कर्म का मानव करते हैं त्याग ,
तब ही विनाश का उद्गार पनपता है।

स्व पर ईर्ष्यालु को संतोष नहीं ।
जीवन आनन्द से वंचित रह जाता ।
दूसरों की वस्तु पर नजर गढ़ाता है।
अपनी गरीब आत्म छवि दर्शाता है।

क्रोध,अक्रोश, संकीर्ण विचार है।
निंदा ही इसकी बन जाती पहचान ,
सद्गुणों का हो जाता है इससे ह्वास।
खुद के चरित्र का हो जाता है विनाश।

ईर्ष्या देती है स्पर्धा को निमंत्रण।
यही हीनता की भावना का स्रोत है।
असमर्थता का होता इसमें अवलोकन।
नफरत की ऑंधी मन को करती विकल।

स्वरचित
डॉ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर,बिहार

तुलसी महिमा

तुलसी महिमा

नमो नमः तुलसी महारानी।
नमो नमो हरि की पटरानी।।
मातु जागो आई जगाने।
प्रेम भाव के पुष्प चढाने।।

विनती मोरी सुन लो मैया।
सुख की हमको दे दो छैया।।
प्रेम कलश भर नीर चढाँऊ।
धूप दीप सेवा में लाँऊ।।

प्रेम भाव से सिंचन करते।
अन्न-धन के भण्डारे भरते।।
मास कतकी कल्याण प्रदाता।
वरदायक है तुलसी माता।।

दूल्हे सालिगरामजी आए।
एकादश में ब्याह रचाए।।
खुशियों की गूँजी शहनाई।
भक्ति ने मिल गाई बधाई।।

मंगल मोद मुदित मन रीझो।
भक्ति वरदान हमको दीजो।।
दुख दरिद्र निकट नहीं आता।
जो नित मंगल दीप जलाता।

तुलसी माँ सुख संपत्ति दाता।
भक्तों की तुम भाग्य विधाता।।
हाथ जोड़ कर तुम्हें मनाएं।
चरण कमल रज शीश चढाएं।।

मेरे अवगुण बिसरा देना।
माँ आँचल की छैया देना।।
माँ ‘सीमा’ तेरी बालक है।
तू माता सबकी पालक है।।

कृष्ण प्रिया शुभ मंगल दाता।
जो जन मात शरण में आता।।
अंत समय मुख में दल रहता।
यम की त्रास से मुक्ति पाता।।

अक्षत,पुष्प ले थाल सजाए।
करें आरती जन सुख पाएं।।
दास सहज में दर्शन पाता।
मानव जन्म सफल हो जाता ।।

षडरस व्यंजन खूब बनाए।
पकवानों से थाल सजाए।।
छप्पन व्यंजन भोग लगाए।
तुलसी से हरि खूब मनाए।।

राखो मेरी लाज भवानी।
‘सीमा’ महिमा रोज बखानी।।
जीवन में मंगल सुख आता।
चित्त लगा के पाठ जो गाता।।

✍️ सीमा गर्ग मंजरी
मौलिक सृजन
मेरठ कैंट उत्तर प्रदेश
सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

प्रबोधिनी एकादशी

प्रबोधिनी एकादशी

पावन पवित्र कार्तिक मास,
शुक्ल पक्ष एकादशी,
प्रबोधिनी एकादशी कहलाती।

भगवान विष्णु की पूजा अर्चना का,
विशेष महत्व, कार्तिक मास में होता। ।

प्रबोधिनी एकादशी को,
श्री हरि विष्णु जागते योग निद्रा से,
देते प्रबोधन चराचर जगत को।
गलती जो हुई हमसे,
प्रायश्चित करो और सुधार करो। ।

विशेष महत्व ग्रंथों पुराणों में,
एकादशी का बतलाया।
उपवास सभी सनातनी करते।
शोक, ताप ,पाप नष्ट हो जाते। ।

मन निगृह का उत्तम मार्ग है उपवास।
प्रबोधिनी एकादशी का व्रत जो करते,
भव बंधन छूट जाते,मन वांछित फल पाते।
सुख- संपत्ति, संतति घर में लाते।।

जिनके घर ऑंगन तुलसी का वास।
मन इच्छा पूरी होती बिना प्रयास। ।

🙏🌹चंद्रकला भरतिया नागपुर🙏

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